अलंकार
अलंकार शब्द का अर्थ है अलंकृत या विभूषित करने वाला है। जिस प्रकार आभूषण शरीर को बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य के सौन्दर्य को बढ़ाते हैं।
1. परिभाषा— “काव्य के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले धर्म (तत्त्व) अलंकार कहलाते हैं।”
2. अलंकार के भेद— अलंकार दो प्रकार के— (1) शब्दालंकार, एवं (2) अर्थालंकार माने गये हैं।
अलंकार-परिचय
(1) मानवीकरण अलंकार
परिभाषा— जहाँ मानव के अतिरिक्त निर्जीव और अमूर्त पर मानव सुलभ गुण, धर्म आदि का आरोप करके मानव के समान प्रस्तुत किया जाता है, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।
उदाहरण—
“प्यारे जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें,
अरुण पंख तरुण किरण खड़ी खोल द्वार
जागोगे फिर एक बार।”
यहाँ तारे और किरण को जगाने तथा द्वार खोलने की मानवीय क्रिया करते हुए चित्रित किया गया है। अतः इसमें मानवीकरण अलंकार है।
(2) पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार
परिभाषा— जहाँ एक ही शब्द का समान अर्थ में एक से अधिक बार प्रयोग होता है, वहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार होता है।
उदाहरण— “पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं।”
यहाँ ‘पुनि’ शब्द की समान अर्थ में आवृत्ति हुई है। अतः पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
(3) अतिशयोक्ति अलंकार
परिभाषा— जहाँ लोक की मर्यादा को पार करके किसी वस्तु का अत्यन्त बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाये, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण—
“हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आगि।
लंका सारी जरि गई गये निशाचर भागि॥”
यहाँ हनुमान की पूँछ में आग लगने से पहले ही लंका का जलना वर्णित है, अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होगा।
(4) अन्योक्ति अलंकार
परिभाषा— जहाँ अप्रस्तुत कथन के द्वारा प्रस्तुत का बोध हो, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है।
(अप्रस्तुत उसे कहते हैं जो प्रसंग में नहीं होता है और प्रस्तुत वह कहलाता है जो प्रसंग का विषय होता है।)
उदाहरण—
माली आवत देखकर कलियन करी पुकार।
फूले फूले चुनि गये, काल्हि हमारी बार॥
माली, कलियाँ और फूल अप्रस्तुत हैं जिनके द्वारा प्रस्तुत काल, प्राणियों और मृत वृद्धों का बोध कराया गया है।
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